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शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

घर आ रहे ‘राम’ स्वागत करो

देर से ही सही, लेकिन अब भारतीय जनता पार्टी वापस अपने हिन्दू ऐजेंडे पर लौट रही है, 1990 के बाद यह पहला मौका है, जब पूरी पार्टी एकजुटता के साथ अपने उसी रंग में लौटने का प्रयास कर रही है, जिसके लिये वो पहचानी जाती थी।  मुस्लिम बुद्धिजीवी और राजनेता आरिफ मोहम्मद खान अक्सर यह कहते हुए मिल जाते हैं कि राम मंदिर के निर्माण को लेकर भारतीय जनता पार्टी गंभीर नहीं थी, वह राम के जरिये सत्ता पाना चाहती थी, उसे सत्ता तो मिली, पर उससे राम का साथ छूट गया। बात तो उनकी सही है सत्ता के साथ राम की पवित्रता और पोरुष ना हो तो वह सत्ता भी व्यर्थ ही है। राम के दूर जाने के बाद भाजपा की राह में काँटों की भरमार हो गई।
 राम  हाशिये पर गये तो कश्मीर भी पीछे छूट गया और समान नागरिक संहिता की बात तो नौजवान भाजपा कार्यकर्ताओं को भी पता नहीं होगी, और इसी के साथ भाजपा का कांग्रेसीकरण शुरू हो गया और आम जनता में यह विश्वास जमने लगा कि भाजपा और कांग्रेस में कोई भी अंतर नहीं  है ? कांग्रेस भी सत्ता के लिए जोड़ तोड़ कर रही है और भाजपा भी देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के लिए राजनीति में आने वाली भाजपा के लिए इससे बुरा दौर हो नहीं सकता था।
इस दौरान भाजपा ने उत्तरप्रदेश  में तो अपनी जगह खोई ही, साथ में हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, उडीसा में भी अपनी स्थिति को कमजोर ही किया। वह दूसरी बड़ी पार्टी से सिमट कर तीसरे चौथे स्थान पर रह गई और क्षेत्रिय दलों ने भाजपा के आधार को कमजोर कर दिया   मजबूत और वैकल्पिक विपक्ष के अभाव में आज भारत में राष्ट्रीय पार्टियों के सामने क्षेत्रिय दलों के साथ गठबंधन की मजबूरी है भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी अक्सर इस दौर को एक व्यक्ति वाली राजनीतिक पार्टी का दौर भी कहते थे, जो अपनी शर्तों पर केन्द्र सरकार को समर्थन देने या ना देने का फैसला करते हैं
दरअसल, सत्ता पाने की इन मजबूरियों के बीच उन राजनीतिक दलों और व्यक्तियों की मौज हो रही है, जो सत्ता में भागीदार तो होते ही हैं अपितु वे मुख्य राजनीतिक दलों को भी अपनी नीतियों को बदल देने के लिये मजबूर कर देते हैं। स्पष्ट जनादेश का अभाव, दोहरी मार कर रहा है, एक तरफ तो वह देश  में जातिगत भेद और राजनीति को ताकत दे रहा है और दूसरी तरफ क्षेत्रिय दलों को भी पनपा रहा है। उनके लिए देश की दशा और दिशा से ज्यादा प्रदेश में उनका राजनीतिक अस्तित्व बना रहना अधिक महत्वपूर्ण है इस बात के प्रत्यक्ष उदाहरण के रूप में  मुलायम सिंह यादव, नीतिश कुमार, मायावती, ममता बनर्जी, करूणाकरण, नवीन पटनायक, शिबू सोरेन, लालू यादव, फारूख अब्दुल्ला और जयललिता जैसे ना जाने कितने राजनेताओं की सूची बनाई जा सकती है जो अपने स्वार्थ के चलते ही ऐसे निर्णय लेते हैं, जिनके कारण उनके पक्ष में वोट देने वाला मतदाता अपने आप को ठगा हुआ महसूस करता है और क्षेत्रवाद और जातीयता का जहर संवैधानिक सत्ता को चुनौती देता हुआ दिखाई देता है।
भ्रष्टाचार के नित प्रतिदिन होने वाले खुलासों ने साबित किया है की देश में बढ़ते भ्रष्टाचार में इन दलों की भूमिका काफी बड़ी है, और इनके कारण केंद्र सरकार को भी सी बी आई जैसा हथियार मिल गया है, जिसका इस्तेमाल कर के वह अपने अल्पमत को बहुमत में बदलकर देश की सत्ता पर काबिज है यू पी   ने अपने दोनों कार्यकालों में अपने इस हथियार का बखूबी इस्तेमाल किया है। इस से पहले यह कम पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव भी कर चुके हैं
तो, ऐसी स्थिति में जब देश और समाज में बिखराव के हालात हैं। मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाली केन्द्र सरकार स्वतंत्र भारत की सबसे दयनीय और कमजोर सरकार  साबित हुई है   देश  की राजधानी दिल्ली में ही कानून और व्यवस्था का मजाक बन चुका है। देश  का युवा, किसान, महिलाएं और मजदूर आक्रोशित हैं   भारत के आर्थिक हालात बेकाबू हो चले हैं, महंगाई लोगों का जीना दुश्वार कर रही है, आंतरिक सुरक्षा के लचर प्रबंधन के चलते नक्सलवाद नई नई जगहों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है, पंजाब में लगभग समाप्त हो चुके अलगाववाद की कुछ चिंगारियों को फिर से हवा दी जा रही है, पड़ोसी देश  नेपाल, पाकिस्तान,चीन, भूटान और बंगलादेश  में से कोई भी भारत का मददगार नहीं है। देश का साम्प्रदायिक सद्भाव बिगड़ रहा है ,चारों तरफ असुरक्षा और अविश्वसनीयता के माहौल से घिरी केन्द्र सरकार का इकबाल समाप्त हो चला  है, वो हर तरफ से बेबस दिखाई पड़ रही है भारत का दुर्भाग्य तो देखिये कि इन परिस्थितियों में भी देश  का विपक्ष भी आग्रह और दुराग्रहों में बंटा हुआ है।
तो यह मानना ही चाहिये कि भारत की इस दुर्दशा के लिए अकेले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कर्मचारीपना ही जिम्मेदार नहीं है, इसके लिए उनके दोनों कार्यकालों के सहयोगी दल और बिखरा हुआ विपक्ष भी जिम्मेदार हैं, जिसके कारण मनमोहन सरकार कोई निर्णय मजबूती के साथ नहीं ले पाई। हांलाकि इन नौ सालों में अमरीका के साथ परमाणु करार और खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश की अनुमति देते समय मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री वाले अंदाज में दिखे। वरना, वो तो हर समय सोनिया गांधी के सेवारतकर्मचारी प्रधानमंत्रीके रूप में ही नजर आये।
तो आज जब जातीयता और क्षेत्रवाद अपने चरम पर हैं तो भाजपा जैसे राजनीतिक दलों को ऐसे नारों और मुद्दों की  आवश्यकता है, जो मतदाताओं के अंतरतम को भारत की विशालता से और उसके मुद्दों से जोड़ सके अयोध्या में राम का भव्य मंदिर के निर्माण का संकल्प और उस पर  बरती जाने वाली ईमानदारी ही भाजपा के परमवैभव के  स्वप्न को साकार करेगी, क्योंकि राम सब देखते हैं कि भाजपा की निष्ठां किस में हैं ,राम में या सत्ता में ?  इस बार तो राम मान भी जाएंगें, लेकिन सत्ता की चाह में पहलेवाली गलती को दोहराया गया, तो राम कभी वापस नहीं आएंगें, क्योंकि राम किसी को ना मारे, ना हत्यारा राम सब खुद ही मर जाएंगें कर कर खोटे काम यही बात तो आरिफ मोहम्मद खान समझा रहे हैं

सुरेन्द्र चतुर्वेदी
(लेखक सेंटर फार मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं।)

शनिवार, 5 जनवरी 2013

इंडियन बुद्धिजीवियों की बलात्कारी बहस में भारत


दिल्ली में हुई गेंगरेप की घटना सभ्य समाज का घिनौना चेहरा है, इस बात पर किसी को भी आपत्ति नहीं है भारत में जिन भी लोगों के हाथों में सत्ता है, उनके अलावा प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा को सुनिश्चित करे। लेकिन जिस तरह का व्यवहारकथित बुद्धिजीवी- टेलीविजन शोमें  कर रहे हैं और जिस तरह की उनकी टिप्पणियां हैं, क्या वह भारत के इन बुद्धिजीवियों के सभ्य होने का प्रमाण दे रही हैं ?
प्रश्न यह उठता है कि क्या भारत में सामूहिक बलात्कार की यह पहली घटना थी ? इससे पहले कभी महिलाओं को शोषित और अपमानित नहीं किया गया ?  जो लोग इन बहसों में चिल्ला चिल्ला कर अपना पक्ष रख रहे हैं, वो यह कैसे भूल जाते हैं कि भारत में नारी को ही पूजा गया और पूजा जाता रहा है, भारत में एक भी ऐसा गांव या कस्बा ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेगा, जिसमें माता का मंदिर ना हो   क्या उनको यह भी याद दिलाना पडे़गा कि प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भारत की सामाजिक स्थिति का वर्णन करते हुए लिखा था कि भारत में अमावस्या की रात में स्वर्ण से सुसज्जित महिला अपने घर से बाहर घूम सकती है, उसकी सुरक्षा और गरिमा को कोई खतरा नहीं है
क्या यह भी याद दिलाना पडे़गा कि सीता के अपमान के कारण रावण की लंका तक इसी भारत के राम ने ध्वस्त की थी, और क्या यह भी याद दिलाने की जरूरत है कि सत्ता के मद में चूर कौरवों  द्वारा द्रोपदी का चीरहरण के प्रयास को भी वासुदेव कृष्ण  ने ही विफल किया था भारत में सदा से ही धर्म को करणीय और अकरणीय आचरण से जोड़ कर देखा गया है   यदि कोई आचरण अनुचित की श्रेणी में आता है, तो उसे अधर्म ही माना गया है, चाहे वह राजा राम द्वारा सीता को दिया गया वनवास हो या पांडवों द्वारा जुए में द्रोपदी को दांव पर लगाना   इन दोनों ही कृत्यों के कारण राजा राम और पांडवों की हजारों वर्ष बीत जाने के बाद भी आलोचना होती है।
यह नेतृत्व पर निर्भर करता है कि वह प्रजाजनों में यह विश्वास पैदा करे कि वह प्रजा की सुरक्षा और गरिमा के प्रति गंभीर है उस समय राम और कृष्ण ने तमाम विपरीत परिस्थितियों में होने के बावजूद नेतृत्व संभाला और अपनी जिम्मेदारी का पालन किया, लेकिन इस मामले में कोई भी नेतृत्वकर्ता आगे नहीं आया और ना ही किसी राजनीतिक व्यक्ति ने इस सामाजिक कलंक से आहत जनता की भावना से अपने आपको जोड़ने की कोशिश ही की। अपितु, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नारी सशक्तिकरण के स्वयंभू बुद्धिजीवियों ने इस घटना का इतनी बार बलात्कार कर डाला कि सारी घटना ही दामिनी फिल्म  के कथानक की तरह हो गई है, जिसमें नायिका अदालत में जा कर कह देती है कि उसे इंसाफ नहीं चाहिये   इस घटना से दुखी दिवंगत पीडिता के परिजनों के मनोभावों और दुखों में सहभाग करने की अपेक्षा ऐसे लोग सड़कों पर निकल कर आये हैं, जो हंसते हुए मोमबत्ती जला रहे हैं, युवाओं की तो क्या कहें, जब दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ही पीडि़ता के दुख में गायक हनीसिंह की धुनों पर नृत्य करने लगें ? क्या यह शर्मनाक नहीं है कि देश का प्रधानमंत्री राष्ट्र के नाम संवेदनहीन सन्देश की खानापूर्ति कर रहे हैं और यू पी की अध्यक्षा इस कोशिश में लगी हैं कि किसी तरह से इस घटना से उनकी पार्टी को लाभ ना मिले तो ना सही, पर राजनीतिक तौर पर नुकसान तो बिल्कुल नहीं होना चाहिये।
दरअसल, 20 साल पहले शुरू किए गए  आर्थिक नवउदारवाद ने सनातन भारतीय चिंतन और समाज परंपरा को आहत किया है बाजारवाद की इस दौड़ में नारी भी अछूती नहीं रही, उसे बेटी और बहन से बदलकर  एक उत्पाद की तरह बेचे जाने की शुरूआत हो चुकी है   बाजार की चकाचैंध ने राजनीति के उच्च मापदंडों को भी प्रभावित किया है, इसीलिए हम देखते हैं कि वीमेन, वैल्थ और वाईन का शौक़ीन अभिजात्य वर्ग उसइंडियाका निर्माण कर रहा है, जिसका एक रूप दिल्ली के गेंगरेप में दिखा। जबकि, असलियत यह है कि भारत के अधिकांश  गांवों में सरकार शौचालय तक नहीं बना पाई है, अधिकतर गांवों में लड़कियों ने इसलिये विद्यालय में जाना छोड़ दिया क्योंकि उनके विद्यालयों में शौचालय की उपलब्धता नहीं थी।
जो लोग इंडिया और भारत का अन्तर नहीं समझते, उन्हैं यह समझना जरूरी है कि गांवों और कस्बों में रहने वाली लड़कियां सबकी लाड़ली बेटियां ही होती हैं   गांव में किसी की भी लड़की हो वो सारे गांव की बेटी होती है और उसी से उसके गांव की इज्जत भी जुड़ी होती है। क्या यह गारंटीइंडियादे सकता है ? 
जरूरत इस बात की है कि सरकार और समाज दोनों ही बिगड़ती सामाजिक परिस्थितियों को समझें   समाज को यह समझना ही होगा कि सिर्फ सरकार के भरोसे सामाजिक सुरक्षा का माहौल तैयार नहीं किया जा सकता है। इसके लिए समाज के प्रत्येक नागरिक को जागरूक होने की जरूरत है। और सरकार को यह नीयत दिखानी होगी कि वह किसी भी अपराधी को दंडित करने में किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं करेगी और ना ही अपराधों और अपराधियों को संरक्षित करने वाले राजनेताओं, उद्योगपतियों, व्यापारियों और दबाव समूहों के सामने नतमस्तक होगी, तभी समाज के नागरिकों के मन में एक भरोसा पैदा होगा कि स्वतंत्र भारत की सरकारें किसी भी व्यक्ति की गरिमा और सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है



सुरेन्द्र चतुर्वेदी
(लेखक सेंटर फार मीडिया रिसर्च और डवलपमेंट के निदेशक  हैं)